बी.ए.द्वितीय वर्ष-तृतीय सत्र- ऐच्छिक हिन्दी प्रश्नपत्र क्र.5 मध्ययुगीन काव्य
1. नामदेव (03) पद
2. कबीर (10) दोहे
3. तुलसीदास (10) दोह चौपाई
4. सूरदास (03) पद
5. रहीम (10) दोहे
6. रैदास (10) दोहे
8. बिहारी (10) दोहे
1. नामदेव
महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के संत तथा विठ्ठल भक्त नामदेव का जन्म हिंगोलो जि- गाँव नरसी बमनी (मराठवाडा) में 1270 में हुआ और 03 जलाई शनिवार को 1350 में पंढरपूर में उन्होंने समाधी ली। उनके दादा का नाम नरहरी शेटी, पिता का नाम दामाशेटी और माता का नाम गोनाई था । वे जाति से दर्जी थे कपड़ों की सिलाई और छपाई उनका पारिवारिक व्यवसाय था । बचपन से ही नामदेव विठ्ठल भक्ति में लगे रहे। नामदेव पांच वर्ष के थे.तब इनके पिता विट्ठल की मूर्ति को दूध का भोग लगाने का कार्य नामदेव को सौंप कर कहीं बाहर चले गए.बालक नामदेव को पता नहीं था कि विट्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, उसे तो भावनात्मक भोग लगवाया जाता है.नामदेव ने मूर्ति के आगे पीने को दूध रखा.मूर्ति ने दूध पीया नहीं, तो नामदेव हठ ठानकर बैठ गए कि जब तक विट्ठल दूध नहीं पीएंगे, वह वहां से हटेंगे नहीं.कहते हैं हठ के आगे विवश हो विट्ठल ने दूध पी लिया. इन कथाओं की कोई ऐतिहासिक विश्वसनीयता नहीं है।
इसी प्रकार कहा जाता है कि एक बार संत नामदेव शिवरात्रि के अवसर पर एक मंदिर में शिव के दर्शन के लिए गये.तभी पंडितो का समाज आया, नीची जाति के लोगो को भजन करते देख उन्हें अच्छा नहीं लगा इसलिए शिव के सामने इनको कीर्तन करता देख पंडितों ने इन्हें वहाँ से हटकर मंदिर के पीछे जाकर भजन कीर्तन करने को कहा, नामदेव जी मंदिर के पीछे चले गये तथा कीर्तन करने लगे. वहाँ एक चमत्कार हो गया और मन्दिर का गर्भ गृह घूमकर नामदेव जी के सामने हो गया. मंदिर का मुह घूमकर नामदेव की ओर हो गया।
कथा कही जाती है कि एक समय आप भजन कर रहे थे तो एक कुत्ता आकर रोटी उठाकर ले भगा. नामदेव जी उस कुत्ते के पीछे घी का कटोरा लिए भागे और कहने लगे भगवान रुखी मत खाओ साथ में घी भी लेते जाओ. जब भगाते भागते थक गए तो रूककर रोने लगे,और जैसे ही रोये वसे ही नामदेव का भाव देखकर भगवान को कुत्ते में से प्रगट होना पडा।
नामदेव को संसार में बांधकर रखने के लिए माता-पिता ने उनका विवाह गोविंद शेटी सदावर्ते की बेटी राजाई से किया गया जिससे उन्हें चार बेटे और एक बेटी हुई। तबभी उनका मन घर गृहस्थी में नहीं लगा तब वे पंढरपूर विठ्ठल की सेवा में चले गए। पंढरपूर में उनकी मुलाकात संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई- बहनों से हुई।
संत नामदेव के गुरू विठोबा खेचर माने जाते हैं। विठोबा खेचर निर्गुणमत के साधक थे। उनसे दिक्षा लेने के बाद उन्होंने उत्तर भारत की पदयात्रा की पंजाब के गुरुदासपुर जिले के घूमान गाँव में वे बस गए जहाँ आज भी बाबा नामदेवजी नामक गुरुद्वारा है। दिल्ली के बादशाह आलम उर्फ अल्लाउद्दीन ने भी घूमान जाकर संत नामदेव से भेंट की थी। कहा जाता है कि मृत्यु के समय नामदेव पंढरपुर में आ गये। और 03 जलाई शनिवार को 1350 को पंढरपुर में उनका देहावसान हुआ।
संत नामदेव हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के आद्य कवि थे। उन्होंने सगुन और निर्गुण पदोंकी रचना की। उनके पदों में ज्ञान और भक्ति का मनिकांचन संयोग है। संत नामदेव मानवतावादी थे उनके पदों में ईश्वरोन्मुखता, गुरु महिमा, सत्सगति, गुणकथन, बोधात्मकता, आत्मनिवेदन तथा राष्ट्रीय भावनात्मक एकता की अभिव्यक्ति हुई है। उन्होने पाखन्ड भक्ति एवं बाह्याडम्बर का विरोध कर एक ईश्वर ही घट-घट एवं चराचर में समान रूप से व्याप्त है ऐसा संदेश दिया। अहिंसा एवं ईश्वर के विषय में वे कहते हैं -
पाहन आगै देव कशीला । बाको प्राण नहीं बाकी पूज रचीला।।
निरजीव आगै सजीव मारै । देषत जनम आपनौ हारै ।।
रचनाएँ- नामदेव की नामदेव गाथा में ढाई हजार मराठी अभंग संकलित है। उनके हिन्दी पदो की संख्या 230 बताई जाती है तो धर्मग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में 61 पद समाविष्ट है। ’सकल संत गाथा’ में आपके 102 हिन्दुस्तानी भाषा के पद संकलित है।
पाठ्यक्रम में निर्धारित
नामदेव के पद
1. नामस्मरण की महत्ता
हरर नांव हीरा हर नांव हीरा ।
हर नांव लेत मटै सब पीरा ।।1।।
हर नांव जाती हर नांव पांति ।
हर नांव सकल जीवन मांत ।।2।।
हर नांव सकल सषुम क रासी ।
हर नांव काटैजम क पासी ।।3।।
हर नांव सकल भवुन ततसारा ।
हर नांव नामदेव उतरै पारा ।।4।।
2. गुरु की महत्ता
सफल जनमु मो कउ गुर किना ।
दुख बिसारि सुख अतंरि लीना ।।1।।
गिआन अजंनु मो कउ गुरि दीना ।
रामनाम बिनु जीवनु मन हीना ।।2।।
नामदेइ सिमरन करि जानां।
जग जीवन सिउ जीउ समानां।।3।।
3. सत्संगति की महत्ता
सत्संगति
मन पंछीया मत पड़ पिंजरे।
संसार मायाजाल रे।।1।।
तन जोवन रूप कारण ।
न कर गर्व गव्हार रे।।2।।
एक दिनमो तिन वरया ।
सदा झमकत काल रे।।3।।
कुंभ काच्या निर भरिया ।
बिनसत नहिं वार रे।।4।।
कहत नामदेव सुन भई साधु।
साधु सगंत धरना रे।।5।।
प्रो.डॉ.संजय जाधव
हिन्दी विभाग,
श्री शिवाजी महाविद्यालय, परभणी